Last Updated:March 12, 2026, 17:26 IST
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्षी दलों के सांसदों ने ऐतिहासिक कदम उठाया है. लगभग 193 सांसदों ने नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं. इसमें 130 लोकसभा और 63 राज्यसभा सांसद शामिल हैं. यह नोटिस संसद के किसी एक सदन में पेश किया जाएगा. आरोप है कि सीईसी ने पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया. अगर मोशन स्वीकार हुआ तो जांच समिति बनेगी और संसद में विशेष बहुमत से फैसला होगा.

नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना होने जा रही है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) और विपक्षी दलों के ‘इंडिया’ गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए औपचारिक नोटिस देने का फैसला किया है. यह पहली बार है जब किसी सीईसी के खिलाफ इस तरह का सख्त कदम उठाया जा रहा है. इससे पहले 1991 में टी. एन. शेषन और 2006 में नवीन चावला के खिलाफ केवल ज्ञापन (मेमोरेंडम) दिए गए थे, लेकिन नोटिस कभी नहीं दिया गया. इस नोटिस की सबसे खास बात यह है कि इसमें किसी डिजिटल सिग्नेचर का उपयोग नहीं किया गया है. सभी सांसदों ने अपने फिजिकल सिग्नेचर किए हैं ताकि इसकी गंभीरता बनी रहे. सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं. शुक्रवार को यह नोटिस किसी एक सदन में पेश किया जा सकता है.
विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार पर लगाए 7 संगीन आरोप
सूत्रों के अनुसार नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सात गंभीर आरोप लगाए गए हैं. इनमें प्रमुख आरोप इस प्रकार बताए जा रहे हैं:
पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण रवैया कुछ मामलों में भेदभावपूर्ण फैसले चुनावी गड़बड़ी की जांच में बाधा मतदाताओं को सूची से हटाने के आरोप प्रशासनिक अधिकारों का गलत उपयोगविपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग ने कई मौकों पर सत्तारूढ़ दल को फायदा पहुंचाने वाले फैसले लिए. खासकर मतदाता सूची के विशेष संशोधन को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं.
सीईसी को पद से हटाने की प्रक्रिया क्या है
भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया बेहद कठिन मानी जाती है. संविधान के अनुसार यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने जैसी ही होती है. प्रक्रिया के मुख्य चरण इस प्रकार हैं:
सांसदों द्वारा नोटिस दिया जाता है सदन के अध्यक्ष या सभापति इसे स्वीकार करते हैं जांच के लिए समिति गठित होती है समिति आरोपों की जांच करती है संसद में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पास होना जरूरीविशेष बहुमत का मतलब है कि सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का दो तिहाई समर्थन जरूरी होगा.
क्या कहते हैं नियम और संख्या बल?
नियमों के मुताबिक, लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर नोटिस के लिए जरूरी होते हैं. विपक्ष के पास फिलहाल यह संख्या पर्याप्त मात्रा में है. ‘इंडिया’ ब्लॉक के अलावा आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसदों ने भी इस पर साइन किए हैं, जो अब आधिकारिक तौर पर इस गुट का हिस्सा नहीं है. जज जांच अधिनियम 1968 कहता है कि यदि दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस दिया जाता है, तो जांच समिति तभी बनेगी जब दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाए.
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दीपक वर्मा (Deepak Verma) एक पत्रकार हैं जो मुख्य रूप से विज्ञान, राजनीति, भारत के आंतरिक घटनाक्रमों और समसामयिक विषयों से जुडी विस्तृत रिपोर्ट्स लिखते हैं. वह News18 हिंदी के डिजिटल न्यूजरूम में डिप्टी न्यूज़...और पढ़ें
Location :
New Delhi,Delhi
First Published :
March 12, 2026, 17:26 IST

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