तेल की महंगाई के बीच भारत में एक और 'आपदा' की आहट, सरकार को अभी से करनी होगी तैयारी

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तेल की महंगाई के बीच भारत में एक और 'आपदा' की आहट, अभी से करनी होगी तैयारी

Last Updated:March 13, 2026, 13:19 IST

El Nino and Rain In India: ईरान में जंग से तेल महंगा हो गया है, जिससे भारत पर असर पड़ेगा. वहीं इस साल एल नीनो की संभावना जताई जा रही है, जिससे मानसून कमजोर हो सकता है. इससे खेती पर प्रतिकूल असर पड़ सता है. सरकार को अभी से तैयारी करनी होगी.

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इस साल एक बार फिर एल नीनो बनने की संभावना है. इससे भाकत में कम बारिश होगी और खेती पर असर पड़ेगा. फोटो- रायटर

El Nino and Rain In India: ईरान में जंग की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की महंगाई के बीच भारत में एक और ‘आपदा’ की आहट सुनाई देने लगी है. जंग की वजह से पहले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गया है. इससे भारत सहित दुनिया की सभी अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ना तय है. भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी तेल आयात करता है. अगर तेल के भाव लगातार इसी तरह बढ़ता है तो इसका असर सीधे महंगाई पर पड़ेगा. तेल कंपनियों को पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने पड़ेंगे. इस बीच एक खबर आ रही है. उससे भी एक आपदा की आहट सुनाई दे रही है. दरअसल, अमेरिकी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) की क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर ने अपडेट जारी किया है, जिसमें इस साल एल नीनो (El Nino) बनने की संभावना काफी मजबूत हो गई है. जून-अगस्त तिमाही यानी भारत में मानसून के दौरान एल नीनो के उभरने की 62 फीसदी संभावना बताई गई है, जो बाद के महीनों में 80 फीसदी से ज्यादा हो सकती है.

ये पिछले फरवरी अपडेट से काफी ज्यादा है, जहां जुलाई-सितंबर के लिए सिर्फ 52 फीसदी संभावना जताई गई थी. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट मुताबिक जाने माने मौसम विज्ञानी एम राजीवन कहते हैं कि अगले दो महीनों में क्लियर पिक्चर आएगा, लेकिन आईएमडी सहित दुनिया की प्रमुख मौसम एजेंसियों के मुद्दे पर एक तरह की सहमति दिखती है कि इस साल एल नीनो आएगा. राजीवन केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सेक्रेटरी रह चुके हैं. राजीवन ने कहा कि एल नीनो के कारण भारत में औसत से कम मानसूनी बारिश हो सकती है. ऐसे में सरकार को इसके लिए अभी से तैयारी करनी होगी.

क्या है एल नीनो

एल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य-पूर्वी हिस्से में पानी के गर्म होने की स्थिति है. इससे हवाओं का पैटर्न बदल जाता है और पूरी दुनिया का मौसम प्रभावित होता है. 1980 से अब तक 14 बार एल नीनो आया, जिनमें से 9 बार भारत में मानसून कमजोर रहा. बारिश लंबे समय के औसत से कम से कम 10 प्रतिशत कम रहा. 2018 में भी बारिश 9.4 प्रतिशत कम हुई.

एल नीनो और खराब मानसून का रिश्ता मजबूत है, लेकिन अपवाद भी हैं. सबसे बड़ा उदाहरण 1997 का है, जब बहुत तेज एल नीनो के बावजूद मानसून सामान्य रहा. वजह थी भारतीय महासागर द्विध्रुव (IOD) का सकारात्मक होना, जिसने एल नीनो का असर कम किया. यूरोपीय मौसम केंद्र ने एल नीनो की वजह से और तेज गर्मी की बात कही है. वहां सुपर एल नीनो यानी बहुत तेज वाली स्थिति की संभावना बताई गई है, जो अभूतपूर्व गर्मी की लहरें ला सकती है.भारत के लिए ये दोहरी मुसीबत है.

भारत के लिए दोहरी चुनौती

एक तरफ ईरान की जंग से वैश्विक तेल बाजार में कीमतें बहुत बढ़ गई हैं, जो भारत जैसी तेल आयात करने वाली अर्थव्यवस्था पर बोझ डाल रही हैं. दूसरी तरफ एल नीनो से मानसून कमजोर होने पर खेती, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी. देश की आधी से ज्यादा खेती बारिश पर निर्भर है और करोड़ों किसान इससे जुड़े हैं. सरकार को अभी से योजना बनानी होगी. पानी का बेहतर प्रबंधन, सिंचाई बढ़ाना, खाद्यान्न का भंडार मजबूत करना और ग्रामीण इलाकों को प्रोत्साहन जैसे कदम हो सकते हैं.

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संतोष कुमार

न्यूज18 हिंदी में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत. मीडिया में करीब दो दशक का अनुभव. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आईएएनएस, बीबीसी, अमर उजाला, जी समूह सहित कई अन्य संस्थानों में कार्य करने का मौका मिला. माखनलाल यूनिवर्स...और पढ़ें

First Published :

March 13, 2026, 13:19 IST

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