Last Updated:March 16, 2026, 16:56 IST
पिछले साल केंद्र सरकार ने लद्दाख के सोनम वांगचुंग पर एनएसए लगा दिया था. उसके बाद वो जोधपुर जेल में थे लेकिन केंद्र सरकार ने अचानक इसे हटाते हुए उन्हें रिहा कर दिया. आखिर कैसा है ये 45 साल पुराना कानून. क्यों इसे बहुत कड़ा कहा जाता है, जिसमें जल्दी कानूनी मदद भी नहीं मिलती. जानते हैं इसको लगाने और हटाने की प्रक्रिया.

लद्दाख के सोनम वांगचुक पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) 26 सितंबर 2025 को लगाया गया. अब 13 मार्च 2026 को उन पर से रासुका हटा लिया गया. ये कानून कब किसी पर लागू जाता है, तब इसकी प्रक्रिया क्या होती है और कब इसे हटाया जाता है, उस समय भी इसका प्रोसेस क्या होता है. लद्दाख में हिंसक प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था बिगड़ने के कारण वांगचुक को हिरासत में लिया गया था. तब सरकार ने आरोप लगाया कि वांगचुक ने प्रदर्शनकारियों को उकसाया.
अब जबकि उन पर एनएसए हटाया गया है तो हटाने का कारण लद्दाख में शांति बहाल करना, आपसी विश्वास बढ़ाना और रचनात्मक संवाद को प्रोत्साहित करना बताया गया. हम इस कठोर कानून के बारे में जानेंगे. साथ में ये भी कि इसे किसी पर लागू करने की प्रक्रिया क्या होती है और कौन इसे कैसे हटा सकता है.
एनएसए यानि नेशनल सेक्युरिटी कानून क्या है और इसे कब लागू किया जाता है?
- राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम यानि NSA भारत का एक कठोर कानून है, इसको राज्य की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए लागू किया जाता है. सरकार जब देखती है कि किसी की वजह से हालात बिगड़ सकते हैं या कोई किसी अराजकता को जन्म दे रहा है या देश या राज्य की शांति व्यवस्था के लिए गंभीर दिक्कत पैदा कर रहा है या कर सकता है तो वो उसके खिलाफ एनएसए लागू करती है.
ये कानून 1980 में लागू किया गया था, ये कानून संदिग्ध व्यक्तियों को बिना मुकदमे के 3 से 12 महीने तक हिरासत में लेने की अनुमति देता है. इसके तहत जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस आयुक्त हिरासत आदेश जारी कर सकता है. सामान्य कानून में किसी को गिरफ्तार करने के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी होता है लेकिन NSA में सरकार को लंबी छूट मिलती है.
NSA का मुख्य उद्देश्य ‘निवारक निरोध’ यानि प्रिवेंटिव डिटेंशन है यानी अपराध होने से पहले ही उसे रोकना. इसे इन स्थितियों में लागू किया जाता है
– यदि सरकार को लगे कि कोई व्यक्ति सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में बाधा डाल रहा है.
– यदि व्यक्ति की गतिविधियों से देश की सुरक्षा को खतरा हो
– भारत के दूसरे देशों के साथ संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए.
– समुदाय के लिए आवश्यक सेवाओं और आपूर्ति की बहाली में बाधा डालने पर.
इसे अब तक कितने लोगों पर लागू किया जा चुका है?
सटीक राष्ट्रीय आंकड़े तो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन 2017-2018 में पूरे भारत में 1,198 लोगों पर NSA लगाया गया. मध्य प्रदेश में 795 मामले दर्ज हुए तो उत्तर प्रदेश में 338 मामले. यानि इन दोनों राज्यों में इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुआ. इनमें से कई को बाद में रिहा किया गया.
इस कानून को किसी के खिलाफ लागू करने की प्रक्रिया क्या होती है?
- ये आदेश जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस आयुक्त द्वारा जारी किया जा सकता है. लेकिन संबंधित राज्य सरकार को इस आदेश की तुरंत पुष्टि करनी होती है. इसमें पुलिस किसी को बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है. हिरासत में लिए गए व्यक्ति को आमतौर पर वकील की मदद लेने का अधिकार भी नहीं होता. हालांकि हिरासत में लिए जाने के 5 से 15 दिनों के भीतर व्यक्ति को उन कारणों के बारे में बताया जाना चाहिए,जिनके आधार पर उसे पकड़ा गया है.
इसके बाद इस मामले में आगे क्या प्रक्रिया होती है?
- संविधान के अनुच्छेद 22 और NSA की धारा 9 के तहत एक ‘एडवाइजरी बोर्ड’ का गठन किया जाता है. गिरफ्तारी के 3 सप्ताह के भीतर मामला बोर्ड के सामने रखा जाता है. बोर्ड में उच्च न्यायालय के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश होते हैं. यदि बोर्ड को लगता है कि हिरासत के पर्याप्त कारण नहीं हैं तो सरकार को व्यक्ति को तुरंत रिहा करना पड़ता है.
इस मामले में पीड़ित व्यक्ति कब वकील की मदद ले सकता है और कोर्ट में गुहार लगा सकता है?
- राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत कानूनी राहत पाने की प्रक्रिया सामान्य आपराधिक मामलों से काफी अलग और कठिन होती है. जब हिरासत में लिए गए व्यक्ति का मामला एडवाइजरी बोर्ड के सामने पेश किया जाता है, तो भी उसे वकील के माध्यम से अपना पक्ष रखने का कानूनी अधिकार नहीं होता. उसे अपना बचाव खुद ही करना पड़ता है. हिरासत के दौरान शुरुआती पूछताछ में भी वकील की मौजूदगी अनिवार्य नहीं है.
यद्यपि एनएसए में सीधे तौर पर नियमित जमानत का प्रावधान नहीं है. हालांकि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के परिजन या मित्र अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट या अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर कर सकते हैं.
यदि गिरफ्तारी की प्रक्रिया में कोई गलती हुई हो. यदि हिरासत के कारण बहुत पुराने या अस्पष्ट हों. यदि राज्य सरकार ने एडवाइजरी बोर्ड को समय पर जानकारी न दी हो. यदि व्यक्ति को उसकी भाषा में गिरफ्तारी के कारण न समझाए गए हों. तो कोर्ट ना केवल दखल दे सकता है बल्कि पीड़ित व्यक्ति को राहत दे सकता है, रासुका यानि एनएसए को रद्द कर सकता है.
एनएसए यानि रासुका को कब और कैसे हटाया जाता है?
- एनएसए के तहत हिरासत की एक अधिकतम सीमा तय है. एक व्यक्ति को एक बार में अधिकतम 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है. हालांकि यदि नए सबूत मिलते हैं, तो सरकार इस अवधि को बढ़ा भी सकती है. वैसे राज्य या केंद्र सरकार किसी भी समय हिरासत के आदेश को वापस ले सकती है या उसे रद्द कर सकती है. जैसा सोनम वांगचुक के साथ हुआ. केंद्र सरकार ने उनके खिलाफ रासुका को वापस ले लिया. वैसे अगर सलाहकार बोर्ड भी अनुकूल रिपोर्ट नहीं देता तो भी एनएसए हटा लिया जाता है.
ये कड़ा कानून कौन सी सरकार लेकर आई थी. इसकी वजह क्या थी?
- राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 (NSA) को इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने 23 सितंबर 1980 को संसद में पेश किया. 27 दिसंबर 1980 को राष्ट्रपति की मंजूरी से इसे लागू किया गया. इसे मीसा के निरस्त होने के बाद लाया गया. जिस समय ये कानून इंदिरा गांधी की सरकार ने बनाया तब पंजाब में खालिस्तान आंदोलन तेज हो रहा था, देशभर में साम्प्रदायिक दंगे व अस्थिरता थी. आपातकाल (1975-77) के बाद कांग्रेस सत्ता में लौटी थी और सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए उसे कठोर कानून की जरूरत महसूस हुई. तब ये कानून जम्मू-कश्मीर छोड़कर पूरे भारत में लागू हुआ.
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Sanjay Srivastavaडिप्टी एडीटर
लेखक न्यूज18 में डिप्टी एडीटर हैं. प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया में काम करने का 30 सालों से ज्यादा का अनुभव. लंबे पत्रकारिता जीवन में लोकल रिपोर्टिंग से लेकर खेल पत्रकारिता का अनुभव. रिसर्च जैसे विषयों में खास...और पढ़ें
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Noida,Gautam Buddha Nagar,Uttar Pradesh
First Published :
March 16, 2026, 16:56 IST

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